गुरुवार, 16 जनवरी 2014

सूरज भैया बाहर आओ

सूरज भैया बाहर आओ,
इस सर्दी से हमें बचाओ.

ओढ़ रजाई तुम कोहरे की 
बड़े मज़े में सोए रहते.
ठंड और कोहरे के कारण 
हम हैं क़ैद घरों में रहते.

दांत किटकिटाने लगे हमारे,
अब तो तुम बाहर आ जाओ.

सडकों पार सोने वालों की 
तकलीफों के बारे में सोचो.
जिनके तन पर वस्त्र नहीं हैं,
उन के बारे में भी सोचो.

आ जाओ बाहर रजाई से,
अपनी धूप हमें दिखलाओ.

पानी जम कर बर्फ़ हो गया,
ठंडी हवा है तन को लगती.
पशु पक्षी बैठे हैं छुप कर,
लेकिन भूख नहीं है बुझती.

बहुत सो लिए सूरज भैया,
नींद छोड़ बाहर आ जाओ.

....कैलाश शर्मा 

17 टिप्‍पणियां:

  1. यहाँ रहते हुए तो मुझे भी यह बाल कविता रोज़ ही गानी पड़ेगी...:)) बहुत सुंदर बाल कविता।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (17.01.2014) को "सपनों को मत रोको" (चर्चा मंच-1495) पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

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  3. मीठी मीठी ... कुनमुनाती सी कविता ... बहुत खूब ...

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  4. बच्‍चों को सर्दी वाकई परेशान कर रही है। सुन्‍दर।

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  5. बहुत अच्छी रचना..
    सूरज भैय्या जल्दी बहार आये तो अच्छा है..
    ठंडी कि वजह से मम्मी कही बहार जाने नहीं देती...
    :-)

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  6. बढ़िया प्रस्तुति-
    बधाई स्वीकारें आदरणीय-

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  7. सूरज को तो बाहर आना ही है ..बहुत सर्दी है..

    उत्तर देंहटाएं
  8. कल 19/01/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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