गुरुवार, 21 जुलाई 2011

घमंडी शेर (काव्य-कथा)



शेर  घमंडी एक  जंगल में,
उसने एक दिन कुआ देखा.
झाँका जब अंदर को उसने,
अपना चेहरा पानी में देखा.


मैं हूँ इस जंगल का राजा,
दूजा शेर यहाँ क्यों आया.
उसने झाँक  कुए में पूछा,
तू है कौन यहाँ क्यों आया.


वह आवाज गूँज कर आयी,
तू है कौन यहाँ क्यों आया.
सुनकर यह आवाज़ वहाँ से,
गुस्सा बहुत शेर को आया.


बोला मैं जंगल का राजा,
आयी वह आवाज़ गूँज कर.
गुस्सा बहुत शेर को आया,
कूद पड़ा वह उसके  अंदर.


डूब गया पानी के अंदर,
उसने अपनी जान गंवाई.
था घमंड शक्ति के ऊपर,
नहीं बुद्धि थी उसने पायी.


शक्ति और बुद्धि दोनों हों,
वही सदा है आगे बढता.
केवल शक्ति के घमंड से,
बुद्धिहीन शेर सा मरता.

10 टिप्‍पणियां:

  1. सरक-सरक के निसरती, निसर निसोत निवात |
    चर्चा-मंच पे आ जमी, पिछली बीती रात ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. मैं हूँ इस जंगल का राजा,
    दूजा शेर यहाँ क्यों आया.
    उसने झाँक कुए में पूछा,
    तू है कौन यहाँ क्यों आया.
    --
    सुन्दर रचना!
    बुद्धिर्यस्य बलम् तस्य!

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  3. चंपक में कभी ऐसी कहानियाँ पढ़ा करता था लेकिन काव्य रूप आज पढ़ा. अच्छी पंक्तियों का इस्तेमाल है.

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  4. शेर की कहानी बच्चों को शुरू से रोमांचित करती आयी है. बस इसी रोमांच का लाभ इस काव्य-कथा को सुनाकर भी मिलेगा. अभिनय के साथ इस कथा को कहा जाए तो और भी मजेदार हो जायेगी.

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  5. सुन्दर मजेदार काव्य रचना|

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  6. बचपन में पढ़ी हुई कविता आज फिर से पढ़कर बहुत अच्छा लगा! बहुत सुन्दरता से आपने प्रस्तुत किया है!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  7. बहुत ही सुंदर कविता, मेरे बेटे को बहुत पसंग आयी,
    साभार,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  8. मुझे ये बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है की हिंदी ब्लॉगर वीकली{१} की पहली चर्चा की आज शुरुवात हिंदी ब्लॉगर फोरम international के मंच पर हो गई है/ आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार को इस मंच पर की गई है /इस मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है /आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/इस मंच का लिंक नीचे लगाया है /आभार /

    www.hbfint.blogspot.com

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