सूरज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सूरज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

सूरज भैया बाहर आओ

सूरज भैया बाहर आओ,
इस सर्दी से हमें बचाओ.

ओढ़ रजाई तुम कोहरे की 
बड़े मज़े में सोए रहते.
ठंड और कोहरे के कारण 
हम हैं क़ैद घरों में रहते.

दांत किटकिटाने लगे हमारे,
अब तो तुम बाहर आ जाओ.

सडकों पार सोने वालों की 
तकलीफों के बारे में सोचो.
जिनके तन पर वस्त्र नहीं हैं,
उन के बारे में भी सोचो.

आ जाओ बाहर रजाई से,
अपनी धूप हमें दिखलाओ.

पानी जम कर बर्फ़ हो गया,
ठंडी हवा है तन को लगती.
पशु पक्षी बैठे हैं छुप कर,
लेकिन भूख नहीं है बुझती.

बहुत सो लिए सूरज भैया,
नींद छोड़ बाहर आ जाओ.

....कैलाश शर्मा 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

माँ मुझको एक गीत सुना दो

आज नहीं सुननी है मुझको
राजा रानी की नई कहानी।
मेरे मन में जो प्रश्न उठे हैं 
आज उन्हें माँ तुम सुलझा दो।

तितली रंग बिरंगी क्यों हैं, 
इनके पंख कौन है रंगता।
उड़ती रहती फूल फूल पर
माँ मुझको यह राज बता दो।

चाँद कहाँ दिन में जाता है,
सूरज कहाँ रात्रि में सोता।
दोनों साथ नहीं क्यों रहते,

बात मुझे माँ यह समझा दो।

अलग अलग क्यों रंग फलों के,     
क्यों कुछ खट्टे, कुछ मीठे होते।
कुछ छोटेकुछ बड़े क्यों होते,

माँ मुझ को कारण समझा दो।

पक्षी क्यों उड़ पाते नभ में,
शेर नहीं है क्यों उड़ पाता।
चिड़िया सा मैं उड़ न पाता,    
मुझ को माँ कारण बतला दो।

इन प्रश्नों को कल समझाना, 
मुझको नींद आ रही अब है।
अब तो प्यारे मीठे स्वर में,

माँ मुझको एक गीत सुना दो।

.....कैलाश शर्मा



Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...