सर्वाधिकार सुरक्षित लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सर्वाधिकार सुरक्षित लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

आजादी का ज़श्न मनायें

आज तिरंगा हम फहरायें,
आजादी का ज़श्न मनायें।

कितने हुए शहीद देश पर,
कितने फांसी पर थे लटके।
याद करें हम उन वीरों को,
हुए अमर देश पर मिट के।

नहीं समझ पाये ग़र कीमत,
इन वीरों के बलिदानों की।
व्यर्थ हमारा जीवन होगा,
लाज बचा न पाये माँ की।

हाथ पकड़ कर बढ़ो सभी का,
कहीं न कोई पीछे रह जाये।             
कुछ तक सीमित न विकास हो,
तब असली आजादी आये।

...कैलाश शर्मा 

शनिवार, 7 जून 2014

शेर का सवाल (काव्य-कथा)

जंगल में एक शेर था रहता 
वह था उस जंगल का राजा।
एक भेड़ जब राह से गुजरी
बोला जरा इधर तो आजा।।

भेड़ मुझे तुम यह बतलाओ 
मेरे मुंह से क्या बदबू आती।
डरी हुई वह भेड़ थी बोली 
मुझको सच में बदबू आती।।

सुन कर आया क्रोध शेर को 
उसने उसका गला दबाया।
बिन सोचे सच कहने का फल  
देकर अपनी जान था पाया।।

एक भेड़िया फिर पड़ा सामने 
शेर ने दी आवाज थी उसको।
शेर ने पूछा कि उसके मुंह से  
क्या सच बदबू आती उसको।।

चापलूस था बहुत भेड़िया
बोला तुम जंगल के राजा।
कैसे बू आ सकती मुंह से 
सांस आ रही ताज़ा ताज़ा
।।

बात चापलूसी की सुन कर 
गुस्सा बहुत शेर को आया।
उसने बहुत तेज गुर्रा कर 
उसको फ़ौरन दूर भगाया।
।

एक लोमड़ी उधर से गुज़री
नज़र पड़ी शेर की उस पर।
उसको उसने पास बुलाया 
पहुँची पास शेर के डर कर।
।

शेर ने पूछा सच कहो लोमड़ी 
मेरे मुंह से क्या बदबू आती।
बोली नाक बंद मेरी ज़ुकाम से
इस कारण मैं सूंघ न पाती।
।

सुन कर बात लोमड़ी की था
शेर न उससे कुछ कह पाया।
अपने रस्ते चला गया वह
उसने उसको तुरत भगाया।
।

जैसी जहाँ परिस्थिति होती 
वैसा वहां आचरण करता।
कभी न संकट में वह आता
जीवन उसका सुखमय रहता।
।


....कैलाश शर्मा 

रविवार, 16 मार्च 2014

होली है त्यौहार प्यार का

एक बार फिर होली आयी,
खुशियों की सौगात है लाई.

नीले पीले लाल गुलाबी,
चारों ओर रंग बिखरे हैं.
रंग में छुपे हुए चेहरों पे
नए नए भाव निखरे हैं.

भेदभाव हैं सब छुप जाते,
जब गुलाल प्रेम से लगता.
मिट जाते हैं सब शिकवे,
जब है मित्र गले से लगता.

गले लगाओ आज प्रेम से,
सब के साथ मिठाई खाओ.
कोई भी त्यौहार हो बच्चो,
मिलकर सबके साथ मनाओ.

होली है त्यौहार प्यार का,
भेद भाव सभी मिट जाते.
सभी पुराने मनमुटाव हैं,
दहन हैं होली में हो जाते.

आओ घर से बाहर आओ,
ख़ुशी ख़ुशी त्यौहार मनाओ.

**होली की हार्दिक शुभकामनायें**

...कैलाश शर्मा 


बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

कंकड़ गिनो या स्वर्ण मोहरें (काव्य-कथा)


एक गाँव में धनी व्यक्ति था,
लेकिन वह कंजूस बहुत था।
धन दौलत की कमी नहीं थी,

स्वर्ण मोहर भंडार बहुत था।

एक घड़े में रख कर मोहरें,
घर के पीछे गाड़ दिया था।
नहीं चलेगा पता किसी को 
ऐसा उसने मान लिया था।

ऱोज रात वह पीछे जा कर
घड़ा निकाल के घर में लाता।
एक एक मोहर को गिन कर 
फिर से घड़ा 
गाड़ वह आता।

उसका एक पड़ोसी एक दिन 
उससे मिलने घर पर आया।
शहर भेजने बेटे को पढ़ने 
वह कुछ कर्ज माँगने आया।

बोला सेठ पड़ोसी से अपने 
अभी न उसके पास है पैसा।
उसका काम चल रहा मंदा,

आयेगा फिर कहाँ से पैसा।

बहुत निराश लाचार पडोसी,
वापिस आया अपने घर में।
देख परेशानी भी पड़ोस में,
दया भाव न जागा उर में।

प्रतिदिन की तरह रात्रि को 
सेठ घड़ा निकाल कर लाया।
सोने की मोहरों को गिन कर
फिर उसने वह घड़ा दबाया।

एक चोर यह देख रहा था,
उसने मौके का लाभ उठाया।
ज़मीं खोद कर घड़ा निकाला
और सभी धन लिया चुराया।

उसमें फिर कंकड़ भर करके,    
गाड़ दिया मिट्टी के अन्दर।
सेठ रोज़ की तरह रात्रि को,
घड़ा निकाल ले गया अन्दर।

उसने जैसे ही घड़ा था खोला,
चौंका वो उसमें कंकड़ देख कर.     
मैं तो बिल्कुल बरबाद हो गया,
लगा वह रोने चीख चीख कर।

सुन कर शोर पड़ोसी आया,
सेठ ने उसको हाल सुनाया.
सुन कर बात पड़ोसी बोला
कहाँ से उस पर पैसा आया.

जब मैंने मांगा था पैसा,
तुमने कहा नहीं है पैसा.
झूठ कहा क्यूँ तुमने मुझसे,    
मेरे पास नहीं है पैसा.

इतने सालों से गडा हुआ था
नहीं जरूरत पड़ी थी धन की.
केवल होता था शौक तुम्हारा
गिनती करना केवल धन की.

जिस धन की हो नहीं जरूरत
वह धन कंकड़ सम ही होता.
कंकड़ गिनो या स्वर्ण मोहरें
इसमें तुम्हें फ़र्क क्या पड़ता.

सेठ ने अपनी गलती समझी,
नहीं करूंगा लालच धन का.
परमारथ में उपयोग करूँगा,
नहीं करूँगा संचय धन का.

जिस धन का उपयोग नहीं हो,
वह कंकड़ पत्थर सम होता.
वह ही धन है धन कहलाता,
जिसका सद उपयोग है होता.

....कैलाश शर्मा      .

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

सूरज भैया बाहर आओ

सूरज भैया बाहर आओ,
इस सर्दी से हमें बचाओ.

ओढ़ रजाई तुम कोहरे की 
बड़े मज़े में सोए रहते.
ठंड और कोहरे के कारण 
हम हैं क़ैद घरों में रहते.

दांत किटकिटाने लगे हमारे,
अब तो तुम बाहर आ जाओ.

सडकों पार सोने वालों की 
तकलीफों के बारे में सोचो.
जिनके तन पर वस्त्र नहीं हैं,
उन के बारे में भी सोचो.

आ जाओ बाहर रजाई से,
अपनी धूप हमें दिखलाओ.

पानी जम कर बर्फ़ हो गया,
ठंडी हवा है तन को लगती.
पशु पक्षी बैठे हैं छुप कर,
लेकिन भूख नहीं है बुझती.

बहुत सो लिए सूरज भैया,
नींद छोड़ बाहर आ जाओ.

....कैलाश शर्मा 

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

सेंटा क्लॉज है लगता प्यारा।

इंतज़ार हर साल तुम्हारा,
सेंटा क्लॉज है लगता प्यारा.

सुन्दर लाल चमकता चोंगा,
श्वेत वर्फ सी प्यारी दाढ़ी.
उपहारों की गठरी कंधे पर,
रेंडियर खींच रहा है गाड़ी.

बच्चों को करता वो प्यार है,
इंतज़ार क्रिसमस का रहता.
खुश होते बच्चे मिलकर के,
इंतजार गिफ्ट्स का रहता.

आओ हम सब ख़ुशी मनाएं,
क्रिसमस का त्यौहार मनाएं.
धर्म जाति का भेद भुला कर,
मिलजुल कर त्यौहार मनाएं.

**HAPPY CHRISTMAS**

....कैलाश शर्मा 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

माँ मुझको एक गीत सुना दो

आज नहीं सुननी है मुझको
राजा रानी की नई कहानी।
मेरे मन में जो प्रश्न उठे हैं 
आज उन्हें माँ तुम सुलझा दो।

तितली रंग बिरंगी क्यों हैं, 
इनके पंख कौन है रंगता।
उड़ती रहती फूल फूल पर
माँ मुझको यह राज बता दो।

चाँद कहाँ दिन में जाता है,
सूरज कहाँ रात्रि में सोता।
दोनों साथ नहीं क्यों रहते,

बात मुझे माँ यह समझा दो।

अलग अलग क्यों रंग फलों के,     
क्यों कुछ खट्टे, कुछ मीठे होते।
कुछ छोटे, कुछ बड़े क्यों होते,

माँ मुझ को कारण समझा दो।

पक्षी क्यों उड़ पाते नभ में,
शेर नहीं है क्यों उड़ पाता।
चिड़िया सा मैं उड़ न पाता,    
मुझ को माँ कारण बतला दो।

इन प्रश्नों को कल समझाना, 
मुझको नींद आ रही अब है।
अब तो प्यारे मीठे स्वर में,

माँ मुझको एक गीत सुना दो।

.....कैलाश शर्मा



शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

हंसी खुशी दीपावली मनायें

एक एक दीपक सब लाओ, 
जहां अँधेरा वहां जलाओ.    

होते सब त्यौहार सभी के,
इन्हें सभी के साथ मनाओ,
भेद भाव से दूर रहो तुम,
सब को अपने गले लगाओ.

फुलझड़ियों सी हों मुस्कानें,
हों अनार से खिलते चेहरे.
रहे प्रकाशित सारा जीवन,
मुश्किल नहीं राह में ठहरे.

आसमान उतरा जमीन पर,
चमक रहे धरती पर तारे.
खुशियों की इस दीवाली पर,
घर आँगन लगते हैं प्यारे.

पूजन करके साथ सभी के,
हंसी खुशी दीपावली मनायें.
घर में जो पकवान बने हैं,
आओ सब मिलकर के खायें.

****दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें****

....कैलाश शर्मा 

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

शिक्षक

                **शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें**

दे कर के सम्मान गुरु को,      
जीवन में है सफल बनोगे.
गुरु में श्रद्धा के द्वारा ही    
श्रेष्ठ ज्ञान अधिकारी होगे.

बिना गुरु के ज्ञान कहाँ है,
बिना गुरु भगवान कहाँ है?
चढ़ने सीढ़ी सफलता की
गुरु जैसी सोपान कहाँ है?

जो भी पाठ पढ़ाते शिक्षक,
जीवन राह सुगम हैं करते.
उनकी शिक्षा हैं जो मानते,
वे हैं जीवन में आगे बढ़ते.

शिक्षक का सम्मान जहाँ न,
वह समाज अवनति को जाता.    
बीज सु-संस्कारों के बो कर,   
वह शिक्षक पूजनीय बन जाता. 

....कैलाश शर्मा      

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

कौआ और सांप (काव्य-कथा)

एक पेड़ पर एक कौए ने
अपने लिए बनाया घर था.
पास दूसरे पेड़ के नीचे,
एक सांप का भी घर था.

कौए ने कुछ दिनों बाद में
दिये घोंसले में थे अंडे.
सांप लगा सोचने मन में,
कैसे खा पायेगा वे अंडे.

सुबह गया उड़कर के कौआ
खाने पानी की तलाश में.
सांप चढ़ गया पेड़ के ऊपर
कौए अंडों की तलाश में.

खा कर सब कौए के अंडे,     
लौटा सांप था अपने घर में.
कौआ जब वापिस था आया,
मिले न अंडे उसको घर में.

कई बार हुआ जब ऐसा,
बैठा छुप कर एक पेड़ पर.
निकला सांप एक बांबी से
अंडे खाने को चढ़ा पेड़ पर.

सांप देख कौआ था चिंतित,
मुक्ति मिले कैसे दुश्मन से.
एक दिन उड़ते उड़ते उसने,
देखा सुन्दर ताल गगन से.

महल पास था एक सरोवर
रानी सखियों साथ वहां थी.
वस्त्र, आभूषण रखे किनारे,
जल क्रीड़ा में सभी मग्न थीं.

उठा चोंच में हार कीमती,
कौआ भागा उड़ तेजी से.
शोर मचाने पर रानी के,
सैनिक भागे उसके पीछे.

कौआ ऊपर उड़ता जाता,
सैनिक भाग रहे थे पीछे.
पास पहुंच करके बांबी के,
डाला हार था उसमें नीचे.

पहुंचे सैनिक जब बांबी पर,
लगे तोड़ने उसको भालों से.
सांप निकल जब बाहर आया
मार दिया उसको भालों से.

लेकर हार गए सब सैनिक,
दुश्मन का था अंत हो गया.    
हो गये सुरक्षित उसके अंडे,
भय कौए का दूर हो गया.

बुद्धि का उपयोग जो करता,
सब बाधा से पार वो पाता.
कितना भी हो बलशाली शत्रु,
बुद्धि सम्मुख ठहर न पाता.

....कैलाश शर्मा


शुक्रवार, 14 जून 2013

बारिस धरती का जीवन है

घनघोर घटायें जब आतीं,
धरती खुशियों से हर्षाती.
मन मयूर नाचने लगता,
जब बारिस की बूँदें आती.

बहता पानी जब गलियों में,
बच्चे आकर छप छप करते.
कागज़ की कश्ती जब बहती,
ख़्वाबों में कितने शहर गुज़रते.

पेड़ नहा कर के बारिस में,
हरे हरे पत्तों से सजते.
वर्षा रानी के स्वागत में,
नृत्य मयूर खुशी से करते.

बारिस धरती का जीवन है,
किसान आस से तकते हैं.
जब खेतों में बूँदें गिरतीं हैं,
खुशियों से नाचने लगते हैं.

बारिस में आओ सब भीगें,
मौसम का आनंद उठायें.
मम्मी से फिर कहेंगे जाकर,
गरम पकोड़े हमें खिलायें.

....कैलाश शर्मा 

गुरुवार, 30 मई 2013

बच्चे तो कच्ची मिट्टी हैं


बच्चे तो कच्ची मिट्टी हैं,
जैसे चाहो ढल जायेंगे.
जो राह दिखाओगे उनको,
उन राहों पे बढ़ जायेंगे.

कच्ची मिट्टी के बरतन को
कोमल हाथों गढ़ना होता.
आने पर सही समय पर ही
भट्टी में है तपना होता.

बच्चों का बचपन मत छीनो,
न खेलकूद से उनको रोको.
उनकी रुचियों का ध्यान रखो,
न व्यर्थ उन्हें हर पल टोको.

संस्कार जो ड़ालें बचपन में,
वह ही स्वभाव में ढल जाते.
देते जो शिक्षा हैं बच्चों को,
उसको ही वे आगे अपनाते.

बच्चे तो एक धरोहर हैं,
सपना आने वाले कल का.
जैसा आज उन्हें तुम दोगे,
कल वैसा ही होगा उनका.

....कैलाश शर्मा 

मंगलवार, 7 मई 2013

गर्मी की छुट्टियाँ हो गयीं


अब पुस्तक हैं बंद हो गयीं,
गर्मी की छुट्टियाँ हो गयीं.

अब न ज़ल्दी उठना होता,
न स्कूल की चिंता होती.
वीडियो गेम हैं रोज़ खेलते,
कार्टून पर रोक न होती.

अब मस्ती होती है दिन भर,
चिंतायें सब ख़त्म हो गयीं.

जायेंगे घूमने पहाड़ पर,
हम ऊँचे ऊँचे पहाड़ देखेंगे.
कहीं पे बहते झरने होंगे,
नयी नयी जगह देखेंगे.

ठंडा मौसम होगा पहाड़ पर,
गर्मी से छुट्टी है हो गयी.

हम जायेंगे नानी के भी,
रोज नए पकवान खायेंगे.
घूमेंगे नाना के साथ में,
रोज़ नए टॉयज लायेंगे.

रोज़ सुनेंगे हम नयी कहानी,
खुशियों की बरसात हो गयी.

खुशी खुशी स्कूल जायेंगे,
फिर हम अपना बैग सजाकर.
होगी थकान सब दूर हमारी,
होगी पढ़ाई फिर मन लगाकर.

जब स्कूल खुलेंगे तब देखेंगे,
अभी तो मस्ती है हो गयी.

....कैलाश शर्मा 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...