मंगलवार, 7 मई 2013

गर्मी की छुट्टियाँ हो गयीं


अब पुस्तक हैं बंद हो गयीं,
गर्मी की छुट्टियाँ हो गयीं.

अब न ज़ल्दी उठना होता,
न स्कूल की चिंता होती.
वीडियो गेम हैं रोज़ खेलते,
कार्टून पर रोक न होती.

अब मस्ती होती है दिन भर,
चिंतायें सब ख़त्म हो गयीं.

जायेंगे घूमने पहाड़ पर,
हम ऊँचे ऊँचे पहाड़ देखेंगे.
कहीं पे बहते झरने होंगे,
नयी नयी जगह देखेंगे.

ठंडा मौसम होगा पहाड़ पर,
गर्मी से छुट्टी है हो गयी.

हम जायेंगे नानी के भी,
रोज नए पकवान खायेंगे.
घूमेंगे नाना के साथ में,
रोज़ नए टॉयज लायेंगे.

रोज़ सुनेंगे हम नयी कहानी,
खुशियों की बरसात हो गयी.

खुशी खुशी स्कूल जायेंगे,
फिर हम अपना बैग सजाकर.
होगी थकान सब दूर हमारी,
होगी पढ़ाई फिर मन लगाकर.

जब स्कूल खुलेंगे तब देखेंगे,
अभी तो मस्ती है हो गयी.

....कैलाश शर्मा 

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

मंत्री का चुनाव (काव्य-कथा)


एक राज्य में एक था राजा,
बहुत नेकदिल, बुद्धिमान था.
मंत्री उसके सभी अनुभवी,
बुद्धिमान सब से प्रधान था.

जा कर प्रधान राजा से बोला
राजन मैं अब वृद्ध हो गया.
मुक्त करें अब दायित्वों से
निवृत्ति का है समय हो गया.

राजा हुआ प्रधान से सहमत
पर उसने यह शर्त लगाई.
नया प्रधान को चुनने पर ही
दायित्वों से उन्हें रिहाई.

पूरे राज्य में यह करी मुनादी,
जो भी प्रधान है बनना चाहे.
अपने को जो योग्य है समझे
वह स्वयं राज दरबार में आये.

चार पुरुष दरबार में आये,
पहला बोला मैं वेदों का ज्ञाता.
और दूसरा फिर यह बोला
क्या मेरा नहीं ज्ञान से नाता?                     

सुन प्रधान ने सब की बातें,
कहा परीक्षा मैं सबकी लूँगा.
जो उत्तीर्ण है उसमें होगा,
उसको ही मैं प्रधान चुनूँगा.

एक कमरे में बंद करूंगा,
जिस में दो दरवाजे होंगे.
एक दरवाजे में अन्दर से,
दूजे में बाहर से ताले होंगे.

बाहर पहले बिन चाबी आये,
होगा वही प्रधान राज्य का.
बंद किया कमरों में उनको,
लगा के अन्दर, बाहर ताला.

पंडित जिन्हें घमंड ज्ञान पर अपने,
बैठे दोनों वेद, पुराण खोल कर.
बिन चाबी ताला खुलने की युक्ति,
मिली न उन्हें सब पोथी पढ़कर.

तीजा जन आदत से आलसी
सोचा कौन करे राजा की सेवा.
खा पी कर के मैं अब सोता,
मैं तो आया बस खाने को मेवा.

कुछ तो रहस्य ताला खुलने में,
चौथा युवक था लगा सोचने.
वह दरवाजे के पास में जाकर,
ताला छू कर के लगा देखने.

उसने जैसे ही ताले को छूआ,
खुल कर उसके हाथ आ गया.
दरवाजे से निकल के बाहर,
वह प्रधान के पास आ गया.

अपने साथ युवक को लेकर,
तब प्रधान दरबार में आया.
वह आकर राजा से बोला,
नया प्रधान मैं लेकर आया.

उसने राजा को बतलाया,
ताला केवल लटकाया था.
सब लोगों ने यह समझा,
ताला चाबी से बंद किया था.

राजा को पूरी बात बतायी,
बनने यह प्रधान योग्य है.
बुद्धि का उपयोग है करता,
मेघावी शिक्षित सुयोग्य है.

राजा था हर्षित चुनाव से,
निर्णय प्रधान का था भाया.    
फिर उस युवक को राजा ने,
अपना नया प्रधान बनाया.

केवल पुस्तक ज्ञान न काफ़ी,
व्यवहारिक ज्ञान ज़रूरी होता.
जो कुछ जीवन तुम्हें सिखाता,
वह सब न पुस्तक में होता.  

..कैलाश शर्मा 

रविवार, 24 मार्च 2013

होली का त्यौहार मनाओ


आओ बच्चो बाहर आओ,
होली का त्यौहार मनाओ.

पीले लाल गुलाबी चेहरे
कोई नहीं पहचाना जाता.
होली के गहरे रंगों में
भेदभाव सारा मिट जाता.

धर्म जाति का भेद भुला कर,
आओ सब को गले लगाओ.

होली है त्यौहार रंग का,
लाता नयी उमंग है मन में.
जलें बुराई सब होली में,
उड़ें गुलाल खुशी के नभ में.

खुशियों से रंग दो घर आँगन,
प्रेम गुलाल सदा बरसाओ.

गुझिया पापड़ी और मिठाई,
सब बच्चों को अच्छी लगती.
मिलजुल के सब जब खाते
और भी ज्यादा मीठी लगती.

खुशियों के रंग हों टेसू जैसे,
चहुँ ओर प्रेम रंग बरसाओ.

*****होली की हार्दिक शुभकामनायें***** 

..कैलाश शर्मा 

बुधवार, 13 मार्च 2013

कोयल


कोयल तन की काली होती,
मीठी बोली से मन हर लेती.
अपने मधुर स्वरों के कारण,
जीत प्यार जग का वह लेती.

कौआ कोयल दोनों ही काले,
केवल वाणी में ही अंतर होता.
होती काँव काँव कटु कौए की
कोयल कूक से मन खुश होता.

रंग रूप का मूल्य न होता,
जग में गुण ही हैं पूजे जाते.           
मुंह से निकले शब्द तुम्हारे,
पहचान तुम्हारी हैं बन जाते.

सदा याद रखना तुम बच्चो,
मृदु व्यवहार सभी से रखना.
मीठी वाणी से प्यार पाओगे,           
कटुक वचन कभी न कहना.

कैलाश शर्मा 

मंगलवार, 5 मार्च 2013

अभ्युदय के जन्मदिन पर



               अभ्युदय के जन्म दिन पर नाना और नानी का 
                             ढेरों प्यार और आशीर्वाद 


                      खुशियाँ गौरव का अभ्युदय,
                      सूरज सम हो तेज तुम्हारा.
                      मन हो सौम्य चन्द्रमा जैसा
                      सार्थक हो यह नाम तुम्हारा.

                      जहां रहो खुशियाँ बरसाओ,
                      बनी रहे अंतस की शुचिता.
                      सद्गुण से संपन्न रहो तुम
                      पाओ गंगा जैसी पावनता.

                      बार बार दिन यह आये
                      खुशियाँ लेकर के जीवन में.
                      अभ्युदय जीवन में तेरे
                      यह आशीष सभी के मन में.
                      
                   HAPPY BIRTHDAY

                                   कैलाश शर्मा 

बुधवार, 9 जनवरी 2013

अजनबी पर विश्वास न करना (काव्य-कथा)


एक जंगल में घना पेड़ था,
उसके कोटर में तीतर रहता.
उसका कौआ ख़ास दोस्त था,
वह जुआर के खेत में रहता.

कौए से मिलने की इच्छा से,
तीतर उड़ कर गया खेत पर.
एक खरगोश ने पीछे आकर,
कब्ज़ा किया उसके कोटर पर.

जब तीतर घर आया शाम को,
कोटर में खरगोश को देखा.
तीतर बोला तुम बाहर निकलो,
नहीं जानते है यह घर मेरा?

जब होने लगी बहस दोनों में,
हुए इकट्ठे जंगल के जानवर.
बोले खरगोश से बाहर आओ,
यह तो है तीतर का ही घर.

बोला खरगोश जो घर में रहता,
उसका ही वह घर कहलाता.
मैं बैठा हूँ इस कोटर के अन्दर,
इस पर मेरा हक़ बन जाता.

सभी विचार विमर्श कर के भी
वे नहीं कोई निर्णय कर पाये.
तब सलाह दी बुज़ुर्ग हिरन ने,
निष्पक्ष व्यक्ति को ढूँढा जाये.

तीतर व खरगोश चल दिये,
किसी निष्पक्ष की तलाश में.
उनको मिली जंगली बिल्ली,
जो बैठी थी सुनसान राह में.

तुम क्या हमारा न्याय करोगी,
बिल्ली से बोले वे दोनों जाकर.
बिल्ली बोली मैं ऊँचा सुनती,
कहो बात तुम पास में आकर.

जैसे ही दोनों पास में आये,
बिल्ली झपट पडी दोनों पर.
पकड़ उन्हें अपने हाथों से,
खाया दोनों को खुश होकर.

जो साथी, हमदर्द तुम्हारे,
उनकी राय सदा ही मानो.
अजनबियों की राय हमेशा
सोच समझ कर ही मानो.

कैलाश शर्मा 

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है


हो रहा पुराना वर्ष विदा,
नव वर्ष खुशी लेकर आये.
कुछ ऐसा करना है हमको,
सारे जग में खुशियाँ छाये.

न भेद भाव मनों में हो,
सब ओर प्रेम बरसायें हम.
भूखा सोए न कोई बच्चा
थोड़ा सा उनमें बाँटें हम.

शिक्षा पर सब का हक हो,
बचपन न पिसे मशीनों में.
हैं करें कामना सभी आज,
खुशियाँ हों उनके जीवन में.

नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है,
सब और नयी खुशियाँ लाना.
ऐसा न करें हम कार्य कोई,
जिससे न पड़े फिर शर्माना.

कैलाश शर्मा 
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