शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

आजादी का ज़श्न मनायें

आज तिरंगा हम फहरायें,
आजादी का ज़श्न मनायें।

कितने हुए शहीद देश पर,
कितने फांसी पर थे लटके।
याद करें हम उन वीरों को,
हुए अमर देश पर मिट के।

नहीं समझ पाये ग़र कीमत,
इन वीरों के बलिदानों की।
व्यर्थ हमारा जीवन होगा,
लाज बचा न पाये माँ की।

हाथ पकड़ कर बढ़ो सभी का,
कहीं न कोई पीछे रह जाये।             
कुछ तक सीमित न विकास हो,
तब असली आजादी आये।

...कैलाश शर्मा 

शनिवार, 9 अगस्त 2014

रक्षा बंधन

राखी नहीं है रेशम धागा,
इसमें कितना प्यार भरा है।
बचपन की मीठी यादों का
पूरा इक संसार भरा है।

बहन भाई का प्यारा रिश्ता,
करता है सुदृढ रक्षा बंधन।
कितने भी वे दूर हों चाहे,
आता याद प्यार का बंधन।

बंधा रहे रेशम डोरी में,
भाई बहन का प्यार सदा ही।
खुशियाँ बरसें भाई के घर में,
करे कामना बहन सदा ही।

राखी के एक एक धागे में,
निश्छल प्यार बहन का बसता।
भाई बहन का प्रेम अमर हो,
रक्षा बंधन त्यौहार है कहता।

**रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें**

....कैलाश शर्मा 

शनिवार, 26 जुलाई 2014

विहान के जन्मदिन पर

                 विहान के जन्मदिन पर नाना और नानी का 
                              ढेरों प्यार और आशीर्वाद 

चंचलता, बुद्धि का संगम,
तुम अपनी धुन के पक्के हो।
नटखटपन मन हर लेता है,
लगते तुम सबको अच्छे हो।

सदा प्यार पाओ तुम सबका,
आगे सदैव बढ़ते तुम जाओ।
कभी न कंटक राह में आयें,
हर खुशियाँ जीवन में पाओ।

हो तुम्हें मुबारक जन्म दिवस,
बार बार यह शुभ दिन आये।
मासूमियत तुम्हारी रहे बनी,
हर राह सदा मंज़िल तक जाये।

तुम करो सार्थक नाम है अपना,
नव-विहान खुशियों का लाओ।
अभ्युदय हो जीवन में खुशियाँ,
आशीष, प्यार सभी का पाओ।

...कैलाश शर्मा 

शनिवार, 7 जून 2014

शेर का सवाल (काव्य-कथा)

जंगल में एक शेर था रहता 
वह था उस जंगल का राजा।
एक भेड़ जब राह से गुजरी
बोला जरा इधर तो आजा।।

भेड़ मुझे तुम यह बतलाओ 
मेरे मुंह से क्या बदबू आती।
डरी हुई वह भेड़ थी बोली 
मुझको सच में बदबू आती।।

सुन कर आया क्रोध शेर को 
उसने उसका गला दबाया।
बिन सोचे सच कहने का फल  
देकर अपनी जान था पाया।।

एक भेड़िया फिर पड़ा सामने 
शेर ने दी आवाज थी उसको।
शेर ने पूछा कि उसके मुंह से  
क्या सच बदबू आती उसको

चापलूस था बहुत भेड़िया
बोला तुम जंगल के राजा।
कैसे बू आ सकती मुंह से 
सांस आ रही ताज़ा ताज़ा

बात चापलूसी की सुन कर 
गुस्सा बहुत शेर को आया।
उसने बहुत तेज गुर्रा कर 
उसको फ़ौरन दूर भगाया।

एक लोमड़ी उधर से गुज़री
नज़र पड़ी शेर की उस पर।
उसको उसने पास बुलाया 
पहुँची पास शेर के डर कर।

शेर ने पूछा सच कहो लोमड़ी 
मेरे मुंह से क्या बदबू आती।
बोली नाक बंद मेरी ज़ुकाम से
इस कारण मैं सूंघ न पाती।

सुन कर बात लोमड़ी की था
शेर न उससे कुछ कह पाया।
अपने रस्ते चला गया वह
उसने उसको तुरत भगाया।

जैसी जहाँ परिस्थिति होती 
वैसा वहां आचरण करता।
कभी न संकट में वह आता
जीवन उसका सुखमय रहता।


....कैलाश शर्मा 

रविवार, 16 मार्च 2014

होली है त्यौहार प्यार का

एक बार फिर होली आयी,
खुशियों की सौगात है लाई.

नीले पीले लाल गुलाबी,
चारों ओर रंग बिखरे हैं.
रंग में छुपे हुए चेहरों पे
नए नए भाव निखरे हैं.

भेदभाव हैं सब छुप जाते,
जब गुलाल प्रेम से लगता.
मिट जाते हैं सब शिकवे,
जब है मित्र गले से लगता.

गले लगाओ आज प्रेम से,
सब के साथ मिठाई खाओ.
कोई भी त्यौहार हो बच्चो,
मिलकर सबके साथ मनाओ.

होली है त्यौहार प्यार का,
भेद भाव सभी मिट जाते.
सभी पुराने मनमुटाव हैं,
दहन हैं होली में हो जाते.

आओ घर से बाहर आओ,
ख़ुशी ख़ुशी त्यौहार मनाओ.

**होली की हार्दिक शुभकामनायें**

...कैलाश शर्मा 


बुधवार, 5 मार्च 2014

अभ्युदय के जन्मदिन पर

               अभ्युदय के जन्म दिन पर नाना और नानी का 
                             ढेरों प्यार और आशीर्वाद 
अभ्युदय हो खुशियों का,
सौम्यता तुम्हारी बनी रहे,
तुम रहो प्रेममय ऐसे ही,
मुस्कान तुम्हारी बनी रहे.

जितना देते हो प्यार सदा,
दुगना जीवन में तुम पाओ.
जीवन हो सुरभित फूलों सा,   
हर राह सदा खुशियाँ पाओ.

जीवन में जो भी कर्म करो,
हो गर्व सदा उस पर सब को.  
सद्गुण अपनाओ जीवन में,
हो खुशियों का कारण सब को.  

आशीष सभी का है तुम को,
जीवन में आगे बढ़ते जाओ.      
तुम करो सार्थक नाम स्वयं,             
हर कदम कदम खुशियाँ पाओ.

HAPPY BIRTHDAY

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

कंकड़ गिनो या स्वर्ण मोहरें (काव्य-कथा)


एक गाँव में धनी व्यक्ति था,
लेकिन वह कंजूस बहुत था।
धन दौलत की कमी नहीं थी,

स्वर्ण मोहर भंडार बहुत था।

एक घड़े में रख कर मोहरें,
घर के पीछे गाड़ दिया था।
नहीं चलेगा पता किसी को 
ऐसा उसने मान लिया था।

ऱोज रात वह पीछे जा कर
घड़ा निकाल के घर में लाता।
एक एक मोहर को गिन कर 
फिर से घड़ा 
गाड़ वह आता।

उसका एक पड़ोसी एक दिन 
उससे मिलने घर पर आया।
शहर भेजने बेटे को पढ़ने 
वह कुछ कर्ज माँगने आया।

बोला सेठ पड़ोसी से अपने 
अभी न उसके पास है पैसा।
उसका काम चल रहा मंदा,

आयेगा फिर कहाँ से पैसा।

बहुत निराश लाचार पडोसी,
वापिस आया अपने घर में।
देख परेशानी भी पड़ोस में,
दया भाव न जागा उर में।

प्रतिदिन की तरह रात्रि को 
सेठ घड़ा निकाल कर लाया।
सोने की मोहरों को गिन कर
फिर उसने वह घड़ा दबाया।

एक चोर यह देख रहा था,
उसने मौके का लाभ उठाया।
ज़मीं खोद कर घड़ा निकाला
और सभी धन लिया चुराया।

उसमें फिर कंकड़ भर करके,    
गाड़ दिया मिट्टी के अन्दर।
सेठ रोज़ की तरह रात्रि को,
घड़ा निकाल ले गया अन्दर।

उसने जैसे ही घड़ा था खोला,
चौंका वो उसमें कंकड़ देख कर.     
मैं तो बिल्कुल बरबाद हो गया,
लगा वह रोने चीख चीख कर।

सुन कर शोर पड़ोसी आया,
सेठ ने उसको हाल सुनाया.
सुन कर बात पड़ोसी बोला
कहाँ से उस पर पैसा आया.

जब मैंने मांगा था पैसा,
तुमने कहा नहीं है पैसा.
झूठ कहा क्यूँ तुमने मुझसे,    
मेरे पास नहीं है पैसा.

इतने सालों से गडा हुआ था
नहीं जरूरत पड़ी थी धन की.
केवल होता था शौक तुम्हारा
गिनती करना केवल धन की.

जिस धन की हो नहीं जरूरत
वह धन कंकड़ सम ही होता.
कंकड़ गिनो या स्वर्ण मोहरें
इसमें तुम्हें फ़र्क क्या पड़ता.

सेठ ने अपनी गलती समझी,
नहीं करूंगा लालच धन का.
परमारथ में उपयोग करूँगा,
नहीं करूँगा संचय धन का.

जिस धन का उपयोग नहीं हो,
वह कंकड़ पत्थर सम होता.
वह ही धन है धन कहलाता,
जिसका सद उपयोग है होता.

....कैलाश शर्मा      .
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