रविवार, 16 मार्च 2014

होली है त्यौहार प्यार का

एक बार फिर होली आयी,
खुशियों की सौगात है लाई.

नीले पीले लाल गुलाबी,
चारों ओर रंग बिखरे हैं.
रंग में छुपे हुए चेहरों पे
नए नए भाव निखरे हैं.

भेदभाव हैं सब छुप जाते,
जब गुलाल प्रेम से लगता.
मिट जाते हैं सब शिकवे,
जब है मित्र गले से लगता.

गले लगाओ आज प्रेम से,
सब के साथ मिठाई खाओ.
कोई भी त्यौहार हो बच्चो,
मिलकर सबके साथ मनाओ.

होली है त्यौहार प्यार का,
भेद भाव सभी मिट जाते.
सभी पुराने मनमुटाव हैं,
दहन हैं होली में हो जाते.

आओ घर से बाहर आओ,
ख़ुशी ख़ुशी त्यौहार मनाओ.

**होली की हार्दिक शुभकामनायें**

...कैलाश शर्मा 


बुधवार, 5 मार्च 2014

अभ्युदय के जन्मदिन पर

               अभ्युदय के जन्म दिन पर नाना और नानी का 
                             ढेरों प्यार और आशीर्वाद 
अभ्युदय हो खुशियों का,
सौम्यता तुम्हारी बनी रहे,
तुम रहो प्रेममय ऐसे ही,
मुस्कान तुम्हारी बनी रहे.

जितना देते हो प्यार सदा,
दुगना जीवन में तुम पाओ.
जीवन हो सुरभित फूलों सा,   
हर राह सदा खुशियाँ पाओ.

जीवन में जो भी कर्म करो,
हो गर्व सदा उस पर सब को.  
सद्गुण अपनाओ जीवन में,
हो खुशियों का कारण सब को.  

आशीष सभी का है तुम को,
जीवन में आगे बढ़ते जाओ.      
तुम करो सार्थक नाम स्वयं,             
हर कदम कदम खुशियाँ पाओ.

HAPPY BIRTHDAY

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

कंकड़ गिनो या स्वर्ण मोहरें (काव्य-कथा)


एक गाँव में धनी व्यक्ति था,
लेकिन वह कंजूस बहुत था।
धन दौलत की कमी नहीं थी,

स्वर्ण मोहर भंडार बहुत था।

एक घड़े में रख कर मोहरें,
घर के पीछे गाड़ दिया था।
नहीं चलेगा पता किसी को 
ऐसा उसने मान लिया था।

ऱोज रात वह पीछे जा कर
घड़ा निकाल के घर में लाता।
एक एक मोहर को गिन कर 
फिर से घड़ा 
गाड़ वह आता।

उसका एक पड़ोसी एक दिन 
उससे मिलने घर पर आया।
शहर भेजने बेटे को पढ़ने 
वह कुछ कर्ज माँगने आया।

बोला सेठ पड़ोसी से अपने 
अभी न उसके पास है पैसा।
उसका काम चल रहा मंदा,

आयेगा फिर कहाँ से पैसा।

बहुत निराश लाचार पडोसी,
वापिस आया अपने घर में।
देख परेशानी भी पड़ोस में,
दया भाव न जागा उर में।

प्रतिदिन की तरह रात्रि को 
सेठ घड़ा निकाल कर लाया।
सोने की मोहरों को गिन कर
फिर उसने वह घड़ा दबाया।

एक चोर यह देख रहा था,
उसने मौके का लाभ उठाया।
ज़मीं खोद कर घड़ा निकाला
और सभी धन लिया चुराया।

उसमें फिर कंकड़ भर करके,    
गाड़ दिया मिट्टी के अन्दर।
सेठ रोज़ की तरह रात्रि को,
घड़ा निकाल ले गया अन्दर।

उसने जैसे ही घड़ा था खोला,
चौंका वो उसमें कंकड़ देख कर.     
मैं तो बिल्कुल बरबाद हो गया,
लगा वह रोने चीख चीख कर।

सुन कर शोर पड़ोसी आया,
सेठ ने उसको हाल सुनाया.
सुन कर बात पड़ोसी बोला
कहाँ से उस पर पैसा आया.

जब मैंने मांगा था पैसा,
तुमने कहा नहीं है पैसा.
झूठ कहा क्यूँ तुमने मुझसे,    
मेरे पास नहीं है पैसा.

इतने सालों से गडा हुआ था
नहीं जरूरत पड़ी थी धन की.
केवल होता था शौक तुम्हारा
गिनती करना केवल धन की.

जिस धन की हो नहीं जरूरत
वह धन कंकड़ सम ही होता.
कंकड़ गिनो या स्वर्ण मोहरें
इसमें तुम्हें फ़र्क क्या पड़ता.

सेठ ने अपनी गलती समझी,
नहीं करूंगा लालच धन का.
परमारथ में उपयोग करूँगा,
नहीं करूँगा संचय धन का.

जिस धन का उपयोग नहीं हो,
वह कंकड़ पत्थर सम होता.
वह ही धन है धन कहलाता,
जिसका सद उपयोग है होता.

....कैलाश शर्मा      .

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

सूरज भैया बाहर आओ

सूरज भैया बाहर आओ,
इस सर्दी से हमें बचाओ.

ओढ़ रजाई तुम कोहरे की 
बड़े मज़े में सोए रहते.
ठंड और कोहरे के कारण 
हम हैं क़ैद घरों में रहते.

दांत किटकिटाने लगे हमारे,
अब तो तुम बाहर आ जाओ.

सडकों पार सोने वालों की 
तकलीफों के बारे में सोचो.
जिनके तन पर वस्त्र नहीं हैं,
उन के बारे में भी सोचो.

आ जाओ बाहर रजाई से,
अपनी धूप हमें दिखलाओ.

पानी जम कर बर्फ़ हो गया,
ठंडी हवा है तन को लगती.
पशु पक्षी बैठे हैं छुप कर,
लेकिन भूख नहीं है बुझती.

बहुत सो लिए सूरज भैया,
नींद छोड़ बाहर आ जाओ.

....कैलाश शर्मा 

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

सेंटा क्लॉज है लगता प्यारा।

इंतज़ार हर साल तुम्हारा,
सेंटा क्लॉज है लगता प्यारा.

सुन्दर लाल चमकता चोंगा,
श्वेत वर्फ सी प्यारी दाढ़ी.
उपहारों की गठरी कंधे पर,
रेंडियर खींच रहा है गाड़ी.

बच्चों को करता वो प्यार है,
इंतज़ार क्रिसमस का रहता.
खुश होते बच्चे मिलकर के,
इंतजार गिफ्ट्स का रहता.

आओ हम सब ख़ुशी मनाएं,
क्रिसमस का त्यौहार मनाएं.
धर्म जाति का भेद भुला कर,
मिलजुल कर त्यौहार मनाएं.

**HAPPY CHRISTMAS**

....कैलाश शर्मा 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

माँ मुझको एक गीत सुना दो

आज नहीं सुननी है मुझको
राजा रानी की नई कहानी।
मेरे मन में जो प्रश्न उठे हैं 
आज उन्हें माँ तुम सुलझा दो।

तितली रंग बिरंगी क्यों हैं, 
इनके पंख कौन है रंगता।
उड़ती रहती फूल फूल पर
माँ मुझको यह राज बता दो।

चाँद कहाँ दिन में जाता है,
सूरज कहाँ रात्रि में सोता।
दोनों साथ नहीं क्यों रहते,

बात मुझे माँ यह समझा दो।

अलग अलग क्यों रंग फलों के,     
क्यों कुछ खट्टे, कुछ मीठे होते।
कुछ छोटेकुछ बड़े क्यों होते,

माँ मुझ को कारण समझा दो।

पक्षी क्यों उड़ पाते नभ में,
शेर नहीं है क्यों उड़ पाता।
चिड़िया सा मैं उड़ न पाता,    
मुझ को माँ कारण बतला दो।

इन प्रश्नों को कल समझाना, 
मुझको नींद आ रही अब है।
अब तो प्यारे मीठे स्वर में,

माँ मुझको एक गीत सुना दो।

.....कैलाश शर्मा



शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

हंसी खुशी दीपावली मनायें

एक एक दीपक सब लाओ, 
जहां अँधेरा वहां जलाओ.    

होते सब त्यौहार सभी के,
इन्हें सभी के साथ मनाओ,
भेद भाव से दूर रहो तुम,
सब को अपने गले लगाओ.

फुलझड़ियों सी हों मुस्कानें,
हों अनार से खिलते चेहरे.
रहे प्रकाशित सारा जीवन,
मुश्किल नहीं राह में ठहरे.

आसमान उतरा जमीन पर,
चमक रहे धरती पर तारे.
खुशियों की इस दीवाली पर,
घर आँगन लगते हैं प्यारे.

पूजन करके साथ सभी के,
हंसी खुशी दीपावली मनायें.
घर में जो पकवान बने हैं,
आओ सब मिलकर के खायें.

****दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें****

....कैलाश शर्मा 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...